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श्लोक : 27 / 43

भगवान श्री कृष्ण
भगवान श्री कृष्ण
प्रकृति के अंतर्निहित गुणों के कारण सभी प्रकार के कार्य किए जाते हैं; लेकिन, अहंकार से भ्रमित आत्मा, 'मैं ही कर रहा हूँ' ऐसा सोचती है।
🌀 अहंकार तुम्हारे कार्यों को भ्रमित करता है
कृष्ण के इस वचन में अहंकार का भ्रम प्रकट होता है। आज हम जो कार्य करते हैं उसमें हमारी भूमिका क्या है, इसे समझना चाहिए।
  • 🌪️ अहंकार का भ्रम — अहंकार तुम्हारे कार्यों को भ्रमित करता है।
💭 तुम्हारे कार्यों में कितना अहंकार झलकता है?
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भगवद गीता की व्याख्याएँ AI द्वारा जनित हैं; उनमें त्रुटियाँ हो सकती हैं।